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February 16, 2009

अंग्रेजों की अंग्रेज़ी

भारतवर्ष में अंग्रेज़ी घट-घट में कुछ इस प्रकार बसी है जैसे घी और खिचड़ी। हम भारतीयों का यह मानना है कि इस भाषा को बोलते हुए उच्चारण साफ़ और स्पष्ट होना चाहिए। हम यह भी मानते हैं कि गोरों से अधिक भली प्रकार से हम ही अंग्रेज़ी बोलते हैं- शब्दों के स्पष्ट उच्चारण के साथ। वे तो आधे शब्द खा जाते हैं और बाकी आधों का चूँ-चूँ का मुरब्बा बना देते हैं। इसी बे सिर-पैर की अंग्रेज़ी का शिकार एक दिन हिमांशु भईया बन गए।

यदि आप पहाडों के भ्रमण पर हैं और कभी अल्मोड़ा जाने की सोचें तो वहाँ पहुँचने पर आपको 'सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में आपका स्वागत है' का बड़ा सा पटल दिखाई देगा। क्योंकि अल्मोड़ा के निकट कई दर्शनीय स्थल हैं अतः यहाँ बहुतायत में लोग भ्रमण के लिए आते हैं जिसमें एक बड़ी संख्या में विदेशी भी सम्मिलित हैं। एक दिन जब हिमांशु भईया संध्याकालीन भ्रमण के लिए निकले तो माल रोड पर घूमते-घूमते उन्हें एक विदेशी ने पकड़ लिया। 'एक्स्क्याऊज़ मई' वह बोला। 'यस्' भईया ने कहा। 'खड या ठल मी वर्ज हौअल खालश ' वह बोला। 'पार्डन ' भईया ने उस अश्राव्य वाक्य को फ़िर से सुनने की कोशिश में कहा। 'हौअल खालश, हौअल खालश' वह बोला। एड़ी चोटी का ज़ोर लगाने पर भी भईया उसकी बात समझने में असमर्थ रहे। इज्ज़त का बैंड बजते देख भईया ने अपने कान और मुँह की और इशारा किया और ' आ आ आ ' बोलकर सर हिला दिया। विदेशी व्यक्ति ने किसी दूसरे व्यक्ति की ओर रुख किया, उससे कुछ पूछा और मुस्कुराता हुआ चल दिया। कौतुहलवश भईया उस व्यक्ति के पास गए और बोले 'भाई साब ये पूछ क्या रहा था?' 'वो होटल कैलाश कहाँ है ये पूछ रहा था।' उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

'अब बताओ, लिखा कुछ और है और उसे बोलते कुछ और हैं। इसमें हमारी क्या गलती है?' भईया हँसते हुए हमसे बोले। और इस प्रकार हमारे ट्यूशन के एक सुहावने दिन का अंत हुआ।

January 20, 2009

क्रोध और गुरुत्वाकर्षण

क्रोध एवं गुरुत्वाकर्षण परस्पर सम्बंधित हैं. यह बात अजीब लगती है परन्तु सत्य है. इसका आभास मुझे बचपन से हो चला था.

बात तब की है जब हम नैनीताल में आशुतोष भवन में रहते थे जो कि एक चार मंजिली इमारत थी. इमारत के सामने एक छोटा सा मैदान था जिसपर मकान मालिक का पोता पियूष खडा था. पहली मंजिल के बरामदे पर कहानी का दूसरा पात्र राहुल (जिसे अगर मेरा भाई कहा जाए तो गलत नहीं होगा), खडा हुआ प्रकृति का आनंद ले रहा था.

यह संदेह का विषय है कि राहुल इस बात से अनभिज्ञ था कि पियूष नीचे खडा है. क्योकि राहुल एक सामान्य बालक था और देखने सुनने में भली प्रकार से सक्षम था अतः हम यह मान कर चलते हैं कि राहुल ने पियूष को देख ही लिया था. हम राहुल को एक लापरवाह लड़का भी मान सकते हैं क्योकि राहुल ने लापरवाही दिखाते हुए नीचे की ओर अपने मुख से एक द्रव बहाया अर्थात थूका. थूक ठीक पियूष के पास आकर गिरा. स्थायी क्रोध जो कि किसी को भी कभी भी अपना शिकार बना सकता है पियूष को पकड़ चुका था. इसी क्रोध के प्रभाव में पियूष ने बुद्धि लगाकर ऊपर की ओर थूक दिया. क्योकि पियूष एक छोटा बालक था अतः वह गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत से अनभिज्ञ था और भगवान् ने भी पियूष के लिए इस सिद्धांत को बदलना ज़रूरी नहीं समझा. तो थूक ठीक वही आकर गिरा जहाँ से उसकी उत्पत्ति हुई थी, अर्थात पियूष की नाक के नीचे.

निष्कर्ष यह तो निकलता ही है की क्रोध भी सोच समझकर ही करना चाहिए साथ में यह भी की यदि आप कभी थूकना चाहें तो पहले गुरुत्वाकर्षण का भली प्रकार अध्यन कर लें.