[ यह काल्पनिक कहानी है और इसके पात्र भी एकदम .. अ .. अम्म .. अरे !! वो देखो! हाथी! ]
यह कहानी है कुछ दोस्तों की. बचपन के दोस्त. स्कूल वाले दोस्त. और दोस्त भी ऐसे कि स्कूल के समय शायद ही किसी ने आपस में बात की हो. परन्तु स्कूल से निकलते ही ये सब ऐसे बातें करते थे जैसे परम मित्र हों. लेकिन बातें करने, मिलने जुलने का भी अपना एक माहौल होता है. कभी मन करता है तो कभी नहीं भी करता. समय-समय की बात है. तो इन दोस्तों के नाम थे नागिनी, निचा, पौशल और पौरभ. कहानी है पौरभ की झंड की. झंड का कारण था निचा का फ़ोन - जी हाँ! मोबाइल फ़ोन जो इससे पहले निचा की झंड करा चुका था. कमबख्त कहीं का. और निचा की झंड में हाथ था निचा की मम्मी का. निचा की मम्मी एक लोकप्रिय मम्मी थीं. उसकी सहेलियों के बीच में. निचा की सहेलियां मम्मी से खूब बातें करतीं, उनके साथ हंसतीं बोलतीं. एक बार निचा ने मम्मी को फ़ोन पे बात करते सुना (निचा का फ़ोन नहीं लैंड लाइन). मम्मी खूब हंस हंस कर बात कर रहीं थीं. फ़ोन रखने पर निचा ने पूछा " मम्मी किसका फ़ोन था?"
मम्मी : "कनिका का."
निचा: " तो मेरी बात क्यों नहीं कराई?"
मम्मी: अरे उसने मुझसे बात करने के लिए फ़ोन किया था."
निचा: wtf?! O_o
खैर, बात कुछ ऐसे हुई कि निचा पंतनगर विश्वविद्यालय में पढ़ रही थी. एक दिन वहां से बस में बैठकर वह घर आ रही थी छुट्टियों में. अकेली. निचा के माता पिता अधिकांशतः उसके अकेले सफ़र करने से परहेज़ ही करते थे. अतः निचा की मम्मी थोड़ी विचलित थीं. उस समय निचा के पास नोकिया एन-गेज नामक फ़ोन था. यह फ़ोन उस समय के " कूल " फोंस में आता था. वह इसलिए क्योंकि ये गेम-बॉय जैसा दिखता था और आप इसमें विभिन्न प्रकार के गेम्स खेल सकते थे. परन्तु जब आप फ़ोन पर बात करते थे, तो लाउडस्पीकर की आवश्यकता ही नहीं थी. सारी आवाज़ बाहर आती थी. तो इस मामले में ये ज़रा "अनकूल" फ़ोन था.
निचा बस में बैठी. क्योंकि उसकी मम्मी हर मम्मी की तरह चिंता कर ही रही थीं अतः वह थोड़ी-थोड़ी देर में मोबाइल नामक इस आधुनिक यंत्र का प्रयोग कर समय-समय पर निचा की सुध ले रही थीं. निचा बस में खिड़की की ओर बैठी थी और बगल में कोई व्यक्ति था, थोड़ी बड़ी उम्र का. बस चल पड़ी. थोड़े समय बाद निचा के फ़ोन की घंटी घनघनाई. उसने देखा मम्मी का फ़ोन था.
निचा: " हाँ मम्मी चल गयी बस."
मम्मी: "बगल में कौन बैठा है?"
(बगल वाले अंकल जी ने टेढ़ी आँख से निचा की ओर देखा.)
निचा: (लाल मुंह के साथ) "मम्मी मैं आपसे बाद में बात करुँगी."
मम्मी: "अरे ऐसे बता न. लड़की है तो हाँ बोल, बुड्ढा है तो हाँ हाँ बोल, औरत है तो हाँ हाँ हाँ बोल और लड़का है तो अच्छा-अच्छा बोल. रीता बुआ भी रिनी से ऐसे ही पूछती हैं."
निचा के बगल में बैठे अंकल जी ने निचा को घूरा. बहुत देर हो चुकी थी और तबतक निचा झंड के सागर में नहा चुकी थी. पूरे रास्ते वह लाल मुंह लेकर खिड़की से बाहर देखती रही. तो यह फ़ोन बड़ा ही प्रलयंकारी टाइप का फ़ोन था.
पंतनगर से पढ़ लिखकर निचा पहुंची बैंगलोर. आगे की पढाई करने. संयोग से पौशल भी वहीँ था. अतः एक बार छुट्टियों में दोनों ने यह तय किया कि वह साथ में बैंगलोर निकलेंगे. निचा की मम्मी भी बेफिक्र रहेंगी. पहला गंतव्य था दिल्ली. तत्पश्चात वहां से बैंगलोर के लिए रेलगाड़ी. उस समय नागिनी और पौरभ दिल्ली में ही रहते थे. आप यह मानकर चल सकते हैं कि नागिनी और निचा दोनों ही आलसी किस्म के थे. नागिनी उस समय किसी कंपनी में कार्यरत थी. अतः दोनों ने यह तय किया कि दिल्ली में आकर मिलना तो संभव होगा नहीं फ़ोन पर ही बात कर लेंगे. सही रहेगा.
परन्तु पौरभ आलसी नहीं था. वह निचा और पौशल से मिलने आया. तीनों घूमे फिरे, खाया पिया और तदोपरांत रेलगाड़ी लगने पर उसमें बैठकर गपियाने लगे. तभी पौरभ निचा से बोला - " तूने नागिनी से बात की?"
निचा: " अरे नहीं. अभी करती हूँ." निचा अपना फ़ोन निकालने लगी.
पौरभ- " तेरे फ़ोन में रोमिंग लगेगी. ले मेरे से कर ले."
निचा ने पौरभ का फ़ोन लिया और नागिनी को मिलाया. नागिनी ने नहीं उठाया. निचा ने दूसरी बार पुनः मिलाया. परन्तु नागिनी ने फिर भी नहीं उठाया.
पौरभ: (धीरे से ) "मेरा फ़ोन नहीं उठा रही है वो. तू अपने से ही कर ले"
मरता क्या न करता वाली स्थिति में आकर निचा ने अपने फ़ोन से नागिनी को फ़ोन मिलाया इस डर के साथ कि वो उठा न ले. एक घंटी बजते ही नागिनी ने फ़ोन उठाया.
निचा: "नागू मैं तुझे फ़ोन कर रही थी. तूने.."
नागिनी: "अरे यार पौरभ का फ़ोन आ रहा था इसलिए मैं नहीं उठा रही थी."
निचा: "वो मैं ही थी."
नागिनी: "ओह! (और चिल्लाकर) फ़ोन कहीं स्पीकर पर तो नहीं है?"
निचा: (लाल मुंह के साथ) " नहीं ज़रुरत नहीं है. आवाज़ तेज़ है इसकी"
नागिनी दूसरी ओर भाप बनकर उड़ जाती है.
पौरभ के मुंह पर एक दुःख भरी मुस्कान है. पौशल लगातार हँसे जा रहा है.
(रौशनी धीमी हो जाती है. धीरे धीरे पर्दा गिरता है)
यह कहानी है कुछ दोस्तों की. बचपन के दोस्त. स्कूल वाले दोस्त. और दोस्त भी ऐसे कि स्कूल के समय शायद ही किसी ने आपस में बात की हो. परन्तु स्कूल से निकलते ही ये सब ऐसे बातें करते थे जैसे परम मित्र हों. लेकिन बातें करने, मिलने जुलने का भी अपना एक माहौल होता है. कभी मन करता है तो कभी नहीं भी करता. समय-समय की बात है. तो इन दोस्तों के नाम थे नागिनी, निचा, पौशल और पौरभ. कहानी है पौरभ की झंड की. झंड का कारण था निचा का फ़ोन - जी हाँ! मोबाइल फ़ोन जो इससे पहले निचा की झंड करा चुका था. कमबख्त कहीं का. और निचा की झंड में हाथ था निचा की मम्मी का. निचा की मम्मी एक लोकप्रिय मम्मी थीं. उसकी सहेलियों के बीच में. निचा की सहेलियां मम्मी से खूब बातें करतीं, उनके साथ हंसतीं बोलतीं. एक बार निचा ने मम्मी को फ़ोन पे बात करते सुना (निचा का फ़ोन नहीं लैंड लाइन). मम्मी खूब हंस हंस कर बात कर रहीं थीं. फ़ोन रखने पर निचा ने पूछा " मम्मी किसका फ़ोन था?"
मम्मी : "कनिका का."
निचा: " तो मेरी बात क्यों नहीं कराई?"
मम्मी: अरे उसने मुझसे बात करने के लिए फ़ोन किया था."
निचा: wtf?! O_o
खैर, बात कुछ ऐसे हुई कि निचा पंतनगर विश्वविद्यालय में पढ़ रही थी. एक दिन वहां से बस में बैठकर वह घर आ रही थी छुट्टियों में. अकेली. निचा के माता पिता अधिकांशतः उसके अकेले सफ़र करने से परहेज़ ही करते थे. अतः निचा की मम्मी थोड़ी विचलित थीं. उस समय निचा के पास नोकिया एन-गेज नामक फ़ोन था. यह फ़ोन उस समय के " कूल " फोंस में आता था. वह इसलिए क्योंकि ये गेम-बॉय जैसा दिखता था और आप इसमें विभिन्न प्रकार के गेम्स खेल सकते थे. परन्तु जब आप फ़ोन पर बात करते थे, तो लाउडस्पीकर की आवश्यकता ही नहीं थी. सारी आवाज़ बाहर आती थी. तो इस मामले में ये ज़रा "अनकूल" फ़ोन था.
निचा बस में बैठी. क्योंकि उसकी मम्मी हर मम्मी की तरह चिंता कर ही रही थीं अतः वह थोड़ी-थोड़ी देर में मोबाइल नामक इस आधुनिक यंत्र का प्रयोग कर समय-समय पर निचा की सुध ले रही थीं. निचा बस में खिड़की की ओर बैठी थी और बगल में कोई व्यक्ति था, थोड़ी बड़ी उम्र का. बस चल पड़ी. थोड़े समय बाद निचा के फ़ोन की घंटी घनघनाई. उसने देखा मम्मी का फ़ोन था.
निचा: " हाँ मम्मी चल गयी बस."
मम्मी: "बगल में कौन बैठा है?"
(बगल वाले अंकल जी ने टेढ़ी आँख से निचा की ओर देखा.)
निचा: (लाल मुंह के साथ) "मम्मी मैं आपसे बाद में बात करुँगी."
मम्मी: "अरे ऐसे बता न. लड़की है तो हाँ बोल, बुड्ढा है तो हाँ हाँ बोल, औरत है तो हाँ हाँ हाँ बोल और लड़का है तो अच्छा-अच्छा बोल. रीता बुआ भी रिनी से ऐसे ही पूछती हैं."
निचा के बगल में बैठे अंकल जी ने निचा को घूरा. बहुत देर हो चुकी थी और तबतक निचा झंड के सागर में नहा चुकी थी. पूरे रास्ते वह लाल मुंह लेकर खिड़की से बाहर देखती रही. तो यह फ़ोन बड़ा ही प्रलयंकारी टाइप का फ़ोन था.
पंतनगर से पढ़ लिखकर निचा पहुंची बैंगलोर. आगे की पढाई करने. संयोग से पौशल भी वहीँ था. अतः एक बार छुट्टियों में दोनों ने यह तय किया कि वह साथ में बैंगलोर निकलेंगे. निचा की मम्मी भी बेफिक्र रहेंगी. पहला गंतव्य था दिल्ली. तत्पश्चात वहां से बैंगलोर के लिए रेलगाड़ी. उस समय नागिनी और पौरभ दिल्ली में ही रहते थे. आप यह मानकर चल सकते हैं कि नागिनी और निचा दोनों ही आलसी किस्म के थे. नागिनी उस समय किसी कंपनी में कार्यरत थी. अतः दोनों ने यह तय किया कि दिल्ली में आकर मिलना तो संभव होगा नहीं फ़ोन पर ही बात कर लेंगे. सही रहेगा.
परन्तु पौरभ आलसी नहीं था. वह निचा और पौशल से मिलने आया. तीनों घूमे फिरे, खाया पिया और तदोपरांत रेलगाड़ी लगने पर उसमें बैठकर गपियाने लगे. तभी पौरभ निचा से बोला - " तूने नागिनी से बात की?"
निचा: " अरे नहीं. अभी करती हूँ." निचा अपना फ़ोन निकालने लगी.
पौरभ- " तेरे फ़ोन में रोमिंग लगेगी. ले मेरे से कर ले."
निचा ने पौरभ का फ़ोन लिया और नागिनी को मिलाया. नागिनी ने नहीं उठाया. निचा ने दूसरी बार पुनः मिलाया. परन्तु नागिनी ने फिर भी नहीं उठाया.
पौरभ: (धीरे से ) "मेरा फ़ोन नहीं उठा रही है वो. तू अपने से ही कर ले"
मरता क्या न करता वाली स्थिति में आकर निचा ने अपने फ़ोन से नागिनी को फ़ोन मिलाया इस डर के साथ कि वो उठा न ले. एक घंटी बजते ही नागिनी ने फ़ोन उठाया.
निचा: "नागू मैं तुझे फ़ोन कर रही थी. तूने.."
नागिनी: "अरे यार पौरभ का फ़ोन आ रहा था इसलिए मैं नहीं उठा रही थी."
निचा: "वो मैं ही थी."
नागिनी: "ओह! (और चिल्लाकर) फ़ोन कहीं स्पीकर पर तो नहीं है?"
निचा: (लाल मुंह के साथ) " नहीं ज़रुरत नहीं है. आवाज़ तेज़ है इसकी"
नागिनी दूसरी ओर भाप बनकर उड़ जाती है.
पौरभ के मुंह पर एक दुःख भरी मुस्कान है. पौशल लगातार हँसे जा रहा है.
(रौशनी धीमी हो जाती है. धीरे धीरे पर्दा गिरता है)