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December 24, 2011

झंड न होने देंगे

[ यह काल्पनिक कहानी है और इसके पात्र भी एकदम .. अ .. अम्म .. अरे !! वो देखो! हाथी!  ] 

यह कहानी है कुछ दोस्तों की. बचपन के दोस्त. स्कूल वाले दोस्त. और दोस्त भी ऐसे कि स्कूल के समय शायद ही किसी ने आपस में बात की हो. परन्तु स्कूल से निकलते ही ये सब ऐसे बातें करते थे जैसे परम मित्र हों. लेकिन बातें करने, मिलने जुलने का भी अपना एक माहौल होता है. कभी मन करता है तो कभी नहीं भी करता. समय-समय की बात है. तो इन दोस्तों के नाम थे नागिनी, निचा, पौशल और पौरभ. कहानी है पौरभ की झंड की. झंड का कारण था निचा का फ़ोन - जी हाँ! मोबाइल फ़ोन जो इससे पहले निचा की झंड करा चुका था. कमबख्त कहीं का. और निचा की झंड में हाथ था निचा की मम्मी का. निचा की मम्मी एक लोकप्रिय मम्मी थीं. उसकी सहेलियों के बीच में. निचा की सहेलियां मम्मी से खूब बातें करतीं, उनके साथ हंसतीं बोलतीं. एक बार निचा ने मम्मी को फ़ोन पे बात करते सुना (निचा का फ़ोन नहीं लैंड लाइन). मम्मी खूब हंस हंस कर बात कर रहीं थीं. फ़ोन रखने पर निचा ने पूछा " मम्मी किसका फ़ोन था?"
मम्मी : "कनिका का."
निचा: " तो मेरी बात क्यों नहीं कराई?"
मम्मी: अरे उसने मुझसे बात करने के लिए फ़ोन किया था."
निचा:  wtf?! O_o

खैर, बात कुछ ऐसे हुई कि निचा पंतनगर विश्वविद्यालय में पढ़ रही थी. एक दिन वहां से बस में बैठकर वह घर आ रही थी छुट्टियों में. अकेली. निचा के माता पिता अधिकांशतः उसके अकेले सफ़र करने से परहेज़ ही करते थे. अतः निचा की मम्मी थोड़ी विचलित थीं. उस समय निचा के पास नोकिया एन-गेज नामक फ़ोन था. यह फ़ोन उस समय के " कूल " फोंस में आता था. वह इसलिए क्योंकि ये गेम-बॉय जैसा दिखता था और आप इसमें विभिन्न प्रकार के गेम्स खेल सकते थे. परन्तु जब आप फ़ोन पर बात करते थे, तो लाउडस्पीकर की आवश्यकता ही नहीं थी. सारी आवाज़ बाहर आती थी. तो इस मामले में ये ज़रा "अनकूल" फ़ोन था.
निचा बस में बैठी. क्योंकि उसकी मम्मी हर मम्मी की तरह चिंता कर ही रही थीं अतः वह थोड़ी-थोड़ी देर में मोबाइल नामक इस आधुनिक यंत्र का प्रयोग कर समय-समय पर निचा की सुध ले रही थीं. निचा बस में खिड़की की ओर बैठी थी और बगल में कोई व्यक्ति था, थोड़ी बड़ी उम्र का. बस चल पड़ी. थोड़े समय बाद निचा के फ़ोन की घंटी घनघनाई. उसने देखा मम्मी का फ़ोन था.
निचा: " हाँ मम्मी चल गयी बस."
मम्मी: "बगल में कौन बैठा है?"
(बगल वाले अंकल जी ने टेढ़ी आँख से निचा की ओर देखा.)
निचा: (लाल मुंह के साथ) "मम्मी मैं आपसे बाद में बात करुँगी."
मम्मी: "अरे ऐसे बता न. लड़की है तो हाँ बोल, बुड्ढा है तो हाँ हाँ बोल, औरत है तो हाँ हाँ हाँ बोल और लड़का है तो अच्छा-अच्छा बोल. रीता बुआ भी रिनी से ऐसे ही पूछती हैं."
निचा के बगल में बैठे अंकल जी ने निचा को घूरा. बहुत देर हो चुकी थी और तबतक निचा झंड के सागर में नहा चुकी थी. पूरे रास्ते वह लाल मुंह लेकर खिड़की से बाहर देखती रही. तो यह फ़ोन बड़ा ही प्रलयंकारी टाइप का फ़ोन था.

पंतनगर से पढ़ लिखकर निचा पहुंची बैंगलोर. आगे की पढाई करने. संयोग से पौशल भी वहीँ था. अतः एक बार छुट्टियों में दोनों ने यह तय किया कि वह साथ में बैंगलोर निकलेंगे. निचा की मम्मी भी बेफिक्र रहेंगी. पहला गंतव्य था दिल्ली. तत्पश्चात वहां से बैंगलोर के लिए रेलगाड़ी. उस समय नागिनी और पौरभ दिल्ली में ही रहते थे. आप यह मानकर चल सकते हैं कि नागिनी और निचा दोनों ही आलसी किस्म के थे. नागिनी उस समय किसी कंपनी में कार्यरत थी. अतः दोनों ने यह तय किया कि दिल्ली में आकर मिलना तो संभव होगा नहीं फ़ोन पर ही बात कर लेंगे. सही रहेगा.
परन्तु पौरभ आलसी नहीं था. वह निचा और पौशल से मिलने आया. तीनों घूमे फिरे, खाया पिया और तदोपरांत रेलगाड़ी लगने पर उसमें बैठकर गपियाने लगे. तभी पौरभ निचा से बोला - " तूने नागिनी से बात की?"
निचा: " अरे नहीं. अभी करती हूँ." निचा अपना फ़ोन निकालने लगी.
पौरभ- " तेरे फ़ोन में रोमिंग लगेगी. ले मेरे से कर ले."
निचा ने पौरभ का फ़ोन लिया और नागिनी को मिलाया. नागिनी ने नहीं उठाया. निचा ने दूसरी बार पुनः मिलाया. परन्तु नागिनी ने फिर भी नहीं उठाया.
पौरभ: (धीरे से ) "मेरा फ़ोन नहीं उठा रही है वो. तू अपने से ही कर ले"
मरता क्या न करता वाली स्थिति में आकर निचा ने अपने फ़ोन से नागिनी को फ़ोन मिलाया इस डर के साथ कि वो उठा न ले. एक घंटी बजते ही नागिनी ने फ़ोन उठाया.
निचा: "नागू मैं तुझे फ़ोन कर रही थी. तूने.."
नागिनी: "अरे यार पौरभ का फ़ोन आ रहा था इसलिए मैं नहीं उठा रही थी."
निचा: "वो मैं ही थी."
नागिनी: "ओह! (और चिल्लाकर) फ़ोन कहीं स्पीकर पर तो नहीं है?"
निचा: (लाल मुंह के साथ) " नहीं ज़रुरत नहीं है. आवाज़ तेज़ है इसकी"
नागिनी दूसरी ओर भाप बनकर उड़ जाती है.
पौरभ के मुंह पर एक दुःख भरी मुस्कान है. पौशल लगातार हँसे जा  रहा है.


(रौशनी धीमी हो जाती है. धीरे धीरे पर्दा गिरता है)

February 15, 2009

अंग्रेज़ी चलचित्र न देखने के नुक्सान

यूँ तो भारतवर्ष में रहने वाला जनसमूह भारतीय चलचित्र का शौकीन है ही परन्तु बीते हुए दशक में अंग्रेज़ी सिनेमा ने हम सबके दिलों में पैठ बना ली है। अंग्रेज़ी चलचित्र देखने के कुछ ख़ास लाभ तो नही हैं परन्तु न देखने के नुक्सान अवश्य हैं। अब जैसे हमारी संगीता जी को ही ले लीजिये जिन्हें अंग्रेज़ी सिनेमा में कोई दिलचस्पी न होने के कारण अपनी खोपड़ी भिनभिनानी पड़ी।

पंतनगर विश्वविद्यालय में दर्जन भर से अधिक छात्रावास हैं। इन्हीं में से एक है सरोजिनी भवन जिसमें पठन-पाठन के काल में हम रहा करते थे। इसके पास में माहेश्वरी नामक एक छोटी सी दुकान है जिसमें आश्चर्यजनक रूप से सुई से लेकर सी डी तक हर प्रकार की वस्तुएं मिल जाती हैं। जब यूँ ही कहीं से घूम फ़िर कर हम माहेश्वरी की दुकान पर पहुँचे तो ये आभास हुआ कि उस के आस-पास कुछ समाज में ही रहने वाले असामाजिक तत्त्व मंडरा रहे थे जिनके पास करने के लिए कुछ ख़ास काम न था। अतः जब हम वापस जाने लगे तो उन्होंने डिस्कवरी चैनल चलाते हुए विभिन्न प्रकार के जीव जंतुओं की आवाजें निकालनी प्रारंभ की मानों हमें चुनौती दे रहे हो कि किस जानवर की आवाज़ है बूझो तो जानें। उन सबके मध्य एक अंग्रेज़ी चलचित्र से प्रेरणा लेने वाला भी उपस्थित था। जानत्विक भाषा से ऊपर उठ उसने मनुष्यों की बोली में चार्लीज़ एंजेल्स का उच्चारण किया। टिप्पणी कुछ सटीक थी क्योंकि हम तीन थे जिसमें से कहानी की नायिका संगीता जी के मुखमंडल पर लूसी लिऊ की छाप थी कहा जाए तो अनुपयुक्त न होगा। मैंने और मेरी सहपाठिन ऋचा ने उसके बुद्धिकौशल की प्रशंसा की एवं छात्रावास की और बढ़ गए। वापस पहुँचने पर संगीता कुछ व्याकुल सी दिखाई दी। जब उससे कारण पूछा गया तो वह निष्कपट स्वर में बोली - "मुझे एक बात समझ नहीं आई।" "क्या? " ऋचा ने कौतुहल के साथ पूछा। अंग्रेज़ी चलचित्र के अद्भुत संसार से बेखबर संगीता बोली- "हम लोग तो तीन ही थे, तो फिर उन्होंने चालीस एंजेल्स क्यूँ कहा?"

January 29, 2009

पुस्तकालय और आलस्य

मेरी माँ के हमेशा कहे जाने वाले वचनों में 'आलस्य गरीबी की जड़ है' प्रमुख है। परन्तु शायद उन्हें यह जानकर आश्चर्य न होगा कि यह गरीबी के साथ - साथ उलाहना सुनने और लताड़े जाने का भी द्योतक है।
मैं यह सिद्ध नहीं करना चाह रही कि मैं दीन-हीन भाग्य की मारी हुई हूँ या हर कोई जुतियाता रहता है। न ही काव्या पन्त के मुख से खीझ की पराकाष्ठा में निकला यह वाक्य कि ' भैया हमें तो कुत्ता भी लात मारकर चले जाता है ' मुझपर सही बैठता है, परन्तु मैंने भी कई न सही कुछ दुत्कार की कठिन घड़ियाँ जीवन में झेली हैं।

पंतनगर विश्वविद्यालय का चार मंज़िला पुस्तकालय एशियाई महाद्वीप के कुछ सबसे बड़े पुस्तकालयों में से एक है। इसके बावजूद इसी विश्वविद्यालय के गृह-विज्ञान महाविद्यालय में अपना एक पुस्तकालय है। यह सोचने का विषय है कि इस प्रकार कि कृपा केवल इस महाविद्यालय पर क्यों की गई है, परन्तु अभी हम मूल विषय पर आते हुए यह बता दें कि वि.वि. के हर छात्र - छात्रा को दाखिला लेने पर पुस्तकालय से चार कार्ड प्राप्त होते हैं। यह मुझे भी हो सकते थे, पर लापरवाही और आलस्य मेरे दो भाइयों के समान मेरे साथ-साथ चले तो मैं सर्वथा इनको बनवाने का कष्ट न कर पाई। दूसरे वर्ष में फ़ाइन देकर कार्ड बनवाने का विचार मुझे कुछ सुहाया नहीं और तीसरा एवं चौथा वर्ष भी क्रमशः इसी प्रकार बीत गया।

अध्ययन पूर्ण होने पर वि.वि. में पढ़ रहे विद्यार्थी को एक 'नो-ड्यूज' नामक पर्चा मिलता है। यदि कोई यह प्रामाणित कर दे कि पंतनगर के 'नो-ड्यूज' से बड़ा भी कोई सरदर्द है तो मैं प्रतिज्ञा करती हूँ कि अपनी भविष्य में छपने वाली पुस्तक का विमोचन उसी से करवाउंगी। यह नो-ड्यूज़ सैकड़ों विभागों के सामने अलग-अलग प्रकार के जूते-चप्पल घिसने के पश्चात् पुस्तकालय से होता हुआ भी जाता है। वहाँ आप अपने कार्ड समर्पित कर दें और पुस्तकालय की मल्लिका [ जो हृदयविदारक रूप से एक ख़तरनाक महिला हैं ] के हस्ताक्षर आपके हुए समझिये।

मेरे समक्ष एक जटिल प्रश्न् था- 'कार्ड कहाँ से आए?' चतुराई दिखाते हुए जब मैंने यूँ ही नो-ड्यूज़ करवाने का प्रयत्न किया, तो कुछ समय तक मेरी कार्ड आवंटन संख्या [ जिसके लिए एक और कार्ड होता है ] ढूंढ-ढूंढ कर परेशान एवं भन्नाई पुस्तकालय की साम्राज्ञी यह पता चलने पर कि वह ऐतिहासिक कार्ड कभी बना ही न था, कर्कश आवाज़ में कुछ यूँ बोलीं - " कार्ड बनवाया ही नहीं आज तक? अब क्या करियेगा? हमनें अपनी बीस साल की नौकरी में आज तक ऐसा कोई नहीं देखा जिसने कार्ड न बनवाया हो। जाईये सेंट्रल लाइब्रेरी में पता कीजिये। कार्ड ही नहीं बनवाया है।"
सर उठाने में कष्ट तो था पर एक सरसरी निगाह इधर-उधर दौड़ाने पर यह जानकर संतोष हुआ कि मुझे अधिक लोगों ने न देखा था। बस कुछ हँसते हुए सहपाठी, कुछ अन्य पुस्तकालय कर्मी और तीस- पचास अचम्भे से मेरी ओर देखते हुए जूनियर्स।